मंगलवार, 26 नवंबर 2013

26/11

26/11 है।। कॉलेज के विद्यार्थियों ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया।। जिस विद्यार्थी ने मंच का संचालन किया, उसने याद दिलाया कि कितने शहीद हुए, तब हम मुंबई को बचा पाए।।। हर साल, हर दिन कितने ही वीर शहादत देते हैं।।। पर हमें कहाँ वक़्त की 2 मिनट रुक उन्हें श्रधांजलि दे। कम से कम उनके परिवार को तो सुकून मिले, उनके अपनों को हम याद करते हैं।।
आज खुद से खिन्नता हुई।। अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने का दावा करने वाली "गूंज" ये कैसे भूल गई।।
देर आये पर दुरुस्त आये।।
उन सभी परिवारों को मेरा नमन, भीगी पलकों से ही सही , पर अपने अपनों को हमारी हिफाजत में भेजा।। जो वो न होते, तो मेरा क्या अस्तित्व था।।।
नमन
गुंजन झाझारिया

शनिवार, 9 नवंबर 2013

बड़े-बुजुर्गों की हिदायते

हमारी संस्कृति, पुराना रहन-सहन,  आबोहवा की मैं बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ। हर काम को करने का एक सही ढंग होता था  , हमारे पूर्वजो के पास । चाहे उन्हें ये व्यैज्ञानिक शौध के बारे में ज्ञान न भी हो, चाहे उनके समय शिक्षा का इतना बोलबोला भी न हो। पर उन्हें ज्ञान देने और मार्गदर्शन करने का काम लेखक, गायक भी करते थे। उस समय में भी वो ज्ञान का आदर करना जानते थे।
यदि बात बरसो पुरानी करूँ तो कबीर जी के दोहे बताते थे कि सही व्यवहार और निति क्या है? आज तक मानते हैं उनकी बात हम।
मेरी माँ अक्सर मुझे पुराने मुहावरे, लोकोक्तियाँ सुनाती है, जो आज का विज्ञान शौध करके सिद्ध ही कर रहा है अभी तक। जैसे कुछेक मुझे याद है जो आपको बताती हूँ,
" पेट नरम, पैर गरम  और सर ठंडा" =ये है स्वस्थ शरीर की निशानी। ये लक्षण नहीं हैं तो आप स्वस्थ नहीं हैं।
" पानी पीना छान के, रिश्ता करना जान के" = यानि कोई भी रिश्ता जान परख के करो और पानी हमेशा छना हुआ अर्थार्थ स्वच्छ ही पीओ।
 
आज सुबह के अखबार में लिखा था , कि पानी सुबह खाली पेट जरुर पीना चाहिए। हमारे बड़े- बुजुर्ग तो पालन भी करते थे इसका। चारपाई के पास ही लोटा या जग रखते थे पानी के लिए। और सवेरे प्रातः ही जल ग्रहण करते थे।
बड़े- बुजुर्गो की बात में दम तो होता ही था।
अतः हम अगर हमारे विज्ञान को उन नियम कायदों और बातो के साथ जोड़ दें, तो तरक्की दुगनी गति से होने लगेगी।।।
आप मेरी बात से सहमत हैं या नहीं , इसके बाते में अपने विचार जरुर रखिये।
सुप्रभातम
@गुंजन झाझरिया

व्यवहार

व्यवहार कोई मोबाइल , कपडे या गाड़ी की तरह तो हैं नहीं कि जब जी किया, बदल दिया। आजकल पीले का जमाना है , तो पीला ही खरीदेंगे। ठीक उसी तरह इन दिनों हवा मेरे पक्ष में नहीं तो चलो थोडा चापलूस बन जाते हैं। " गधे को बाप भी वही बना सकता है जिसे बनाना आता हो।" जिस व्यक्ति में यह कला हो।
व्यवहार, संस्कारों और अनुभवों की नींव पर खड़ा वो मकान है जिसकी बनावट नहीं बदली जा सकती ।
हाँ, उस मकान या ईमारत पर पुताई, रंगाई कर , सजा कर एक नया रूप दिया जा सकता है। उसके रख- रखाव का ध्यान रख उसे सदाबहार बनाया जा सकता है। उस मकान को बनाने में यदि कोई खिड़की या रोशनदान की कमी रह गई हो, तो काफी तोड़- फोड़ करनी होगी, बाहर की रौशनी को भीतर ल्लाने के लिए। उन पत्थरों पर वार कीजिए। अपनी बनाई इमारत को टूटता देख तकलीफ होगी। पर उसे सुंदर, मनमोहक रूप देने के लिए आपको अवश्य ये कदम उठाना चाहिए।
@गुंजन झाझरिया

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

रंगीन तितलियाँ

आज पता चला कि तितलियो के रंगीन पंखो और सुन्दर उड़ानों का राज क्या है?
पूछोगे नहीं क्या?
" तितलियों की आंखें इंसानों से ज्यादा रंग देख सकती हैं।"
ये रहा तथ्य । पर तितली के रंगीन देखने से उसके रंगीन दिखने का क्या ताल्लुक ? है न।
अरे, जितनी रंगीन और खूबसूरत दुनिया को देखोगे, उतनी ही सुन्दरता भीतर दिखेगी और उतने ही साफ़ , सुंदर , और कोमल नज़र आओगे ।
तो आज से खुद को रंगीन बनाने की शुरुवात कर ही दीजिये।
सुप्रभातम।

रविवार, 23 सितंबर 2012

बर्फी का रस..

इस भागदौड और मशीनी जिंदगी में "अर्थ" और "दिखावे" से घिरा इंसान भूल गया उस ठन्डे अहसास को, जिसे हम प्रेम, लगाव कहते हैं...जो अंदर तक भिगो कर, मन-मस्तिष्क को शुद्ध कर, आँखों से टपकता है! जिसके होने भर से "मैं इंसान हूँ", "मैं महसूस कर सकता हूँ", "मैं जिन्दा हूँ" का अहसास होता है!
जिदगी की कड़ी धूप में ३ घंटे के भीतर "इंसान क्या है ? " का जवाब चहिये...? अगर सारी चिंताओं को भुलाकर बस ३ घंटे अगर मूक और तृप्त प्रेम को महसूस करना है! तो जाइए और जेब से 200 रुपये का कागज का टुकड़ा निकालकर "बर्फी" से मिलकर आइये...!

"बर्फी " कहानी है मर्फी की..नाम तो था मर्फी (मूक, बधिर)...पर इतना रसीला कि लोग कहने लगे "बर्फी"!
बचपन में पैदा होते ही माँ गुजर गयी! पिता का लाडला...छोटे से घर का ये बर्फी छोटे-मोटे काम कर खुशियाँ बांटता था...! काम सिर्फ पेट की भूख मिटाने भर के लिए..! फिर आई एक लड़की (पैसे वाली नारी) बर्फी की जिंदगी में...आधुनिक और कीमती प्रेम से अनभिज्ञ बर्फी बेइंतहा चाहने लगा था उसे!!! और वो बर्फी की मासूमियत और मिठास से बच नहीं पाई...दिल दे बैठी उसे...लेकिन पैसे वाली नारी की पैसे वाली माँ को अपने "स्टेटस" के आगे बर्फी की सच्चाई छोटी लगी, और उसने अपनी बेटी को "पैसे" वाले इंसान से ब्याह रचाने को राज़ी कर लिया..बर्फी जैसे ऊपर तक प्रेम के सागर में डूबे इंसान को इतना झटका लगा लेकिन फिर भी उसे दुआए दी और उसकी जिंदगी से मुस्कुराता हुआ चला गया....! बर्फी के पिता का देहांत हुआ ..! बर्फी उदास तो हुआ लेकिन एक लड़की "झिलमिल" उसकी मुस्कराहट बनी..."झिलमिल" थी तो युवा लेकिन बुधि बच्चे जितनी विकसित हुई थी...मासूम, झिलमिलाती, टिमटिमाती "झिलमिल" को बर्फी उठाकर लाया था, जब उसके पिता के इलाज के लिए पैसे की जरुरत थी, और झिलमिल के नाना झिलमिल के नाम काफी संपत्ति छो गए थे! लेकिन बर्फी को झिलमिल के खाने से लेकर, उसके सोने तक हर काम संभालना पड़ता था! शुरुवात में बोझ लगी थी उसे झिलमिल, लेकिन किसी भी राह में उसे अकेला नहीं छोड़ा उस "इंसानी देवी" ने उसे...
और इतना साथ दिया कि बर्फी उसके बिना जीना ही भूल गया!! बुढ़ापे में अंतिम साँस भी दोनों ने "आई.सी.यू. " के एक ही सिंगल बेड पर ली...
इस बीच कई तूफ़ान आये दोनों की जिंदगी में...लेकिन वो पाक, मासूम प्रेम को छू तक ना पाए!....
हर बार एक मुस्कराहट छोड़ता बर्फी, उसकी मुस्कराहट की वजह बनती झिलमिल..

ये थी आधी अधूरी कहानी ! " आधी-अधूरी " इसलिए क्युकी मैं उस अहसास को महसूस तो कर पाई...लेकिन पूरी तरह कागज पर नहीं उतार पाई...
झिलमिल का उल्टा बी सिखाना बर्फी को..और बर्फी का आँख मूंदकर झिलमिल के उलटे बी को बर्फी का सीधा बी समझ लेना, (जबकि वह जनता था कि झिलमिल कोई भी काम बिना गलती किये नहीं कर पाती)
जब बर्फी खाना खता तो उसके पास बैठना, उसे खाते देखना! आटे के गुड्डे बनाकर तवे पर सेकना, और फिर बर्फी की थाली में खाने को रख देना..

एक निश्चल प्रेम की अदभुत कहानी थी "बर्फी"..उस ३ घंटे में इंसान होने का अहसास हुआ..और ऐसा स्वप्निल अहसास था कि अभी तक रात को अपने आस-पास जुगनू दिखाई देते हैं!
अभी तक उस ग्लोब से दुनिया उलटी दिखाई देती है!

जाइये और कागज के टुकडो में से कुछ खर्च कर जिंदगी को महसूस कर के आइये...
महसूस करिये कि इस मशीनी दुनिया में क्या है सबसे कीमती , जिसे आप भूल गए हैं! ऐसा क्या है, जो आपके लिए सांसो जितना जरुरी है!
वो है "जिन्दा होने का अहसास".....



ओ..ए....ओ......ख्वाबो ही ख्वाबो में करे बातें......


शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

किस्सा मेरा और मेरी भाषा के अपमान का..

सन्देश :
हिंदी दिवस के दिन मेरी हिंदी भाषा को शत शत नमन...
सभी हिंदी से जुड़े साथीयों, अग्रजों, अनुजों को बधाई...
सभी भाषाएँ पूजनीय होती हैं..किन्तु हमारे लिए हिंदी का स्थान उच्च ही रहेगा..
जिस भाषा में सारी संस्कृति, साहित्य, और खुद के होने का वजूद बसा हो, वो भाषा तो माँ से भी बढ़कर है...हिंदी के स्वाभिमान को चोट ना पहुँचाए..बाकी जिनती भाषाये सीखना, बोलना चाहें, जरुर बोलें...किन्तु हिंदी को, हिंदी बोलने वाले को लज्जित ना करे..


किस्सा:
मैंने स्नातकोत्तर की डिग्री प्रबंधन में प्राप्त की है...वह क्षेत्र जिसे अंग्रेजी ने इतनी बुरी तरह से जकडा है कि हिंदी बोलना महापाप है...कुछ महानुभाव ही समझ पाते हैं कि वाक् कला का मतलब सिर्फ अंग्रेजी बोलना और लिखना नहीं है...!
अब हुआ यूँ कि हमारे नए "dean" महाश्य आये..आते ही उन्होंने हमें "placements" के लिए प्रशिक्षित करने का जिम्मा खुद ले लिया..अपने केबिन में बुलाकर सारा सारा दिन वो हमसे सवाल किया करते, और जवाब तैयार करवाया करते..मुझे "finance club" की प्रतिनिधि बनाया गया...
मेरा भी बड़ा मन करता था कि मैं सभी की मदद करूँ, और हम सब से जुड़े फैसलों में मेरे भी विचार सुने जाए..इसी वजह से मैं हर रोज कुछ नया सोच कर लाती और जितना मेरी समझ में आता उससे बेहतर करने का सोचती...
एक दिन मैं सर से बात कर रही थी...तभी सर मेरी काबिलियत पर बात करने लगे...उन्हें पता था कि मैं लिखती हूँ, और कुछ-एक रचनाएँ भी पढ़ी थी..एकाएक वो मुझसे बोले..
"मैं जानता हूँ कि ये तुम्हारी कला है.पर तुम ये साक्षात्कार में मत बोलना कि मैं ये सब लिखती हूँ ,गलत प्रभाव पडेगा, एक तो तुम हिंदी में लिखती हो, दूसरा ये सब से ये प्रदर्शित होता है कि तुम ज्यादा sensitive हो..."
( ये सब उन्होंने अपनी भाषा अंग्रेजी में कहा था...)
मैं आश्चर्यचकित उन्हें देखती रही..फिर जवाब दिया...
"सर! मैं sensitive हूँ, इससे ये कहाँ दिखता है कि मैं अपना काम ठीक से नहीं करूंगी या विपरीत परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाऊँगी...इंसान का गुण है, और इतना तो पक्का है कि मशीनी मानव से अच्छा कर लूंगी..और जिसे मशीन कि जरुरत हो, वहाँ काम करना मुझे भी पसंद नहीं..
दूसरी बात हिंदी में लिखने, बोलने वाले कई लोग है जो अच्छी कंपनी में, अच्छी पोस्ट पर काम कर रहे हैं..कुछेक के नाम भी गिना दिए.और ज्यादातर विज्ञापन मैंने हिंदी में देखे हैं..कोका-कोला, एयरटेल ही क्यों ना हो..मुझे नहीं लगता कि मुझे ना चुने जाने कि यह एक वजह हो सकती है.."
कुछ हद तक वो मेरी बात से सहमत भी हुए...लेकिन दुःख मुझे ये है कि इससे पहले वो बड़ी कंपनीज में काम कर चुके हैं, बहुत से साक्षात्कार ले चुके हैं...ना जाने कितने काबिल लोगो को उन्होंने हिंदी बोलने या लिखने की वजह से नौकरी से वंचित किया हो..और कर भी रहे हों...

गुंजन झाझारिया "गुंज" 

शनिवार, 4 अगस्त 2012

आने दो राजनीति में



मेरे देश की रामलीला समझने का प्रयत्न किया...पर समझ नहीं आई...
अन्ना जी जब शुरू में अनशन पर बैठे थे पिछले साल, तब तो सारे देश के वासी चिल्ला रहे थे “अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं” ...फिर कुछ दिनों बाद अन्नाजी को सरकार ने धोखा तो दिया ही, जो सरकार की पुरानी आदत है..पर साथ में उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाले लोगो ने भी अपना दामन छुडा लिया..इससे अन्ना जी को यह बात तो समझ आ गई थी कि हमारे भारत देश में कुछ अच्छा करना कितना मुश्किल है..एक तरफ पैसा-पैसा-पॉवर-पॉवर चिल्लाती मिडिया...एक तरफ हमारी भूखी-नंगी सरकार, एक तरफ अनपढ़-गंवार-१०वी या १२वी पास, अपराधिक प्रवर्ती के मंत्री गण, और एक तरफ हमारी बेवकूफ जनता....(माफ कीजियेगा जनता को बेवकूफ कहना स्वाभाविक था, और मेरी गिनती भी उसी में कर सकते हैं..)
अब चारों ओर से ही वार होंगे, तो बड़े से बड़े धुंरधर और सच्चे इंसान की रणनीति में थोड़ी बहुत कमी तो रह जायेगी..
अब आप चाहेंगे कि जो भी बोला है, अक्षरशः समझाया जाए आपको..
१) पैसा –पैसा-पॉवर –पॉवर करती मिडिया.. हाँ , हमारी मिडिया है जो समझती है जनता बेवकूफ है..(जो की है..) तो उसे बेवकूफ बनाओ, जितना हो सके....आपने ध्यान दिया हो ना दिया हो, पर मैंने जरुर दिया है..जब भी कोई दुर्घटना होती है..तो दुर्घटना की सही खबर पहुँचाना, वहाँ कितने हताहत हुए हैं, उनकी सही सही जानकारी देना...और दूर बैठे परिजनों को पीडितों तक पहुंचाने में मदद करना, और भी ज्यादा कुछ करना चाहते हैं तो लोगो को हिम्मत देना, एवं दुर्घटना क्यों हुई, आगे से ऐसी दुर्घटना से कैसे बचा जा सकता है ऐसे अभियान चलाना है, हमारी मिडिया का काम!
और करती क्या है? “हांजी...ताज़ा समाचार हैं कि कल हमारे मुख्य-मंत्री जी दुर्घटना स्थल का दौरा करेंगे,
वो हैलीकॉप्टर से जाएंगे या प्लेन से या पैदल..कितने बजे नाश्ता करेंगे, कितने बजे घर से निकलेंगे, कितने बजे वहाँ पहुंचेगे, कितनी देर रुकेंगे, रोयेंगे या हसेंगे, और अगर सरकार के विरोध में बोलना है तो ये देखिये, ऐसी है हमारी सरकार, देखिये कितनी दुर्घटनाये हुई, हमने मुख्यमंत्री जी को फोन किया किन्तु वो फोन पर नहीं आये...जनता को जवाब चाहिए,,,आखिर सरकार क्या कर रही है? कितनी जिंदगियों को मौत के घाट उतरना पड़ा.....बस..
२) जनता बेवकूफ इसलिए कि जो कह दिया गया उन्होंने मान लिया...हाँ यार सरकार कुछ नहीं करती, मतलब कितने लोग मर गए, सब सरकार की वजह से...बस पैसा खाती है..जैसी हवा चली, उधर बह लिए...जिसने जो कहा मान लिया..और विरोध करने में तो हमारी जनता को पी.एच.डी. है..पुतले फूंकना, नारे लगाना, रेलियां निकालना, इन सब में माहिर है...
३,४) हमारी भूखी-नंगी सरकार, एक तरफ अनपढ़-गंवार-१०वी या १२वी पास, अपराधिक प्रवर्ती के मंत्री गण..इसके बारे में तो कुछ कहने की कोई जरुरत नहीं...पिछले साल अन्ना के समर्थन के समय लोगो को एक हवा में बहते देख इन सब की बौखलाहट बता रही थी कि क्या सही है और क्या गलत...

अब मुद्दे की बात करते हैं, अन्नाजी को भी इन चारों बिमारियों से लड़ना था..वो लड़े,,क्या हुआ अगर कहीं कहीं चूके..या बहुत जगह चूके. मगर उनके इरादों में मुझे कभी गन्दी बू नहीं आई...
जब अन्नाजी की रणनीतियाँ इस धूर्त सरकार, भटकी मिडिया और बेवकूफ जनता की वजह से नहीं चल पाई...तब उन्होंने फैसला किया की उन्हें राजनीती में ही आना होगा, शायद यहीं आकर वो कुछ भला कर सकते हैं देश का..
एक बात यहाँ मैं साफ़ कर दूँ कि मैं यह लेख निष्पक्ष होकर लेख रही हूँ..ना ही मैं अन्ना के समर्थन में हूँ, ना ही विरोध में...!
एक सवाल जो उठ रहा है, वह यह..कि जब सारे घोटालों में लिप्त लोग नेता बन रहे हैं, जब सारे अपराधिक प्रवर्ती के लोग चुनाव लड़ रहे हैं...तो अन्ना जी के राजनितिक फैसले पर इतना विरोध क्यों? अगर आप यह कहते हैं कि अन्ना सिर्फ राजनीती में आना चाहते थे, यह उनका मकसद था, उनके इरादें नेक नहीं हैं.....तो जवाब है “आप ही हैं जनाब, जो सभी भूखे और लूट-पात मचाने वाले नेताओं को वोट देते हैं. ज्यादातर नेताओं के इरादे मुझे ठीक नहीं लगते, तो जिसने इतना अनशन किया, लड़ाई की..उसे भी आने दो मैदान में, एक बार उसे भी मौका दो..अगर कुछ नहीं किया तो बाकी नेताओं की तरह इन्हें भी झेल लेंगे...यदि कुछ अच्छा कर दिया तो ठीक है..
आप घबरा क्यों रहे हैं..क्या आपको वाकई लगता है हमारा लोकतंत्र इतना कमजोर है कि यदि कोई राजनीति में आना चाहता है इसका मतलब वो सिर्फ खाना चाहता है..या फिर कोई भी राजनीती में आकर सचाई की राह नहीं अपना सकता...
यदि ऐसा है तो आप खुद पर सवाल कर रहे हैं...मेरा मानना है कि देश के ढांचे को बदलने के लिए राजनीती के ढांचे को सुधारना होगा..और उसके लिए यदि कोई आगे आये, तो आने दो..हमारा ढांचा इतना बिगड चूका है कि और तो बिगड़ने की कोई गुंजाईश नहीं है...किसी को बिना मौका दिए, आप कैसे तय कर सकते हैं कि वह किस इरादे से और क्यों आना चाहता है...
और एक आखिरी सलाह, मिडिया को सुने, पर उसकी भाषा ना बोले...आप तय करे कि किसमे ज्यादा नुकसान है..मेरे हिसाब से मौका देना ही ठीक रहेगा..इआदों का पता लग जायेगा कि आखिर इतने अनशन क्यों किये? दूसरा हमें कभी यह नहीं लगेगा कि जब कोई आया था मशाल लेकर सुधरने देश, हमने उसका साथ नहीं दिया..
आने दो राजनीती में,..अगर कुछ ना भी किया तो ६० साल से झले रहे हैं ऐसे नेताओं को...५ साल और सही..
जय हिंद..

गुंजन झाझरिया "गुंज"

रविवार, 29 जुलाई 2012

पड़ोसी हमारे..या हमारे पड़ोसी..

पिछले ७-८ साल से अलग अलग शहर भी देखें..कई घर बदले, कई दोस्तों के घर देखे,,और फिर यह बात मेरे ज़हन में उठी ...आप अगर हिंदुस्तान में रहते हैं. और एक आम आदमी हैं..तो इस बात से आप भली बह्न्ति परिचित भी होंगे और मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि १०० में से ९५ लोग इस समस्या से हर रोज झुझते होंगे..वो समस्याये पैदा करने वाली जगह है,  घर के सामने का चबूतरा या घर की गली..नहीं नहीं समस्या जगह नहीं है, किन्तु यहाँ समस्याएं पैदा जरुर होती हैं...
किसी ने कहीं पत्थर लगा दिया,,,किसी ने कही नाली बनवा दी...किसी ने अतिक्रमण कर बड़ा सा चबूतरा बना दिया और किसी ने जबरन सड़क पर ब्रेकर बनवा दिया...वगैरह -२!
पडोसी अक्सर बहस करते पाए जाते हैं हमारे हिन्दुस्तान की गलियों में..
किसी को गली से, सबके भले से कोई वास्ता नहीं..पढ़े-लिखे, अच्छे भले समझदार पड़ोसियों को मिट्टी पत्थर के लिए लड़ते देखा है..और तो एक ही सोसाइटी के लोगो को किसी के घर के पास कचरा फेकने में भी बड़ा मजा आता है..और यह भी अक्सर बहस का मुद्दा रहता है..
एक किस्सा है...
मैं अपने पैत्रक स्थान पर आई कुछ दिन पहले, यहाँ रोड के दोनों तरफ नाली का प्रबंध है..किन्तु रोड के जिस तरफ हमारा घर है, उस तरफ आधी गली में नाली नहीं बनी, उसका कारण है कि हमारे तरफ के घरों के पीछे एक पहाड है,और पहाड के नीचे एक सुन्दर तालाब..(खूबसूरत नज़ारा है..:) ..)....  बरसात के समय में उस तालाब में जायदा पानी भरे तो घरों के लिए नुकसान है अतः सरकार ने वहाँ नाली न बना कर बड़ा नाला बनाने की सोची..अतः नाली नहीं बनाई गई..अब नाली नहीं बनी तो पानी कहाँ जायेगा? इसका हल मेरे पापा ने यह निकला कि जहाँ नाली बंद होती है वहाँ उसे सामने वाली यानी रोड के दूसरी तरफ वाली नाली में मिला दिया जाए जो पूरी ओर अच्छी तरह सिविर लाइन से जुडी है..इससे पानी सड़क पर नहीं फैलेगा..
किया तो भलाई का काम..सभी लोग जिनके घर के आगे नाली नहीं बनी, इस बात से खुश भी हुए..
भई ..सामने वाले लोग लड़ने आ गए..कि हमारी नाली में हम नहीं मिलाने देंगे..:)..बेशक पानी सड़क पर जाए..
उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उन्ही की गली गन्दी हो रही है..गली की सड़क तो उनकी भी है, चाहे रोड के इस तरफ हो या उस तरफ..

इसी तरह एक दोस्त के यहाँ गयी थी ..सोसाइटी है..ओर पार्किंग में हर एक को जगह बांटी गई है, उनके फ्लैट नंबर के आधार  पर...लेकिन फिर भी जान-बूझकर लोग दूसरों की पार्किंग में खड़ी करते हैं गाडी..ओर फिर शुरू होती है बहस..

एक और किस्सा...ऊपर नीचे २ मंजिला फ्लैट हैं..अगर नीचे, ऊपर दोनों  के यहाँ गाड़ी हो तो जरुर चिंता का विषय है...ओर ऊपर वालो को अपनी गाडी पार्क करने को कोई ओर जगह ढूँढना बनता है..लेकिन जब नीचे वालो के यहाँ गाडी ही नहीं है, तो भी अगर वो ऊपर के फ्लैट वालो को गाडी पार्क न करने दें घर के आगे, तो कैसे पड़ोसी हैं.?

पड़ोसी तो वो होता है, जो मिल-जुलकर रहे, दूसरे की तरक्की में चाहे शामिल न हो, लकिन खुश जरुर हो..
पर भाईसाहब यहाँ मतलब हमारे देश में, कहते भी शर्म आती है, मेरे भारत देश में, लोग नियमों को ताक पर रखकर, पड़ोसी हैं ये भूलकर, और तो और सही ओर गलत भूलकर लडते हैं...
जब पड़ोसी के यहाँ कोई खुशी आये तो जल-भून कर राख हो जाते हैं..इर्ष्य, द्वेष तो कूट कूट कर भरा है..
ओर यही दे रहे हैं विरासत में बच्चो को..
अगर मोहल्ले में किसी दूसरे बच्चे के आपके बच्चे से ज्यादा नंबर आये, तो आप यह नहीं देखेंगे कि हमारा बच्चा कितना लायक था, अपने बूते से ज्यादा ही लाया है..आप खुश नहीं होंगे..आप दुखी होंगे...और दुखी भी इसलिए नहीं कि वो आपके बच्चे से ज्यादा लाया है..बल्कि इसलिए कि वो बच्चा यानी उनका बच्चा,यानी आपके पड़ोसी का बच्चा इतने नंबर क्यों लाया है? बस....

और यही बच्चे सीखते हैं...कि वो मुझसे आगे क्यों गया..ये नहीं देखते कि वो कितना काबिल है, उसने कितनी मेहनत करी है... नहीं..
यह इर्श्या भाव हमारी रग्-रग में बस चूका है..इसी कि वजह से तो भाई भाई को मार देता है और पड़ोसी -पड़ोसी को...
यह समस्या जितनी सरल दिखती है, उतनी है नहीं..
पड़ोसियों से झगड़ा मेरे भारत के हर आम नागरिक की दिनचर्या और टेंशन का हिस्सा है..
शायद ये लेख पढकर ही हम सोच सकें, कि ज़रा से फायदे के लिए हम इंसानियत क्यों ताक पर रख देते हैं..?
अगली बार किसी भी बहस से पहले यह जरुर सोचे कि क्या इसका कोई और हल है जिससे दोनों को संतुलित फायदा हो..और बात बन जाए..और अगर लड़ने में आपको मज़ा आने लगा है ..तो इस आदत को सुधारिये..आपकी वजह से कितने लोग मानसिक तनाव में रहते हैं, इसका अनदाज़ा नहीं है शायद आपको..
सद्भावना ओर सौहार्द से जीने में किसी का नुकसान नहीं है...यकिन मानिये आपका भी नहीं है...

copyright गुंजन झाझरिया "गुंज"




सोमवार, 23 जुलाई 2012

प्रिय समाज,


प्रिय समाज,

आप तो सकुशल ही रहते हैं...मैं आपको यह खत इसलिए लिख रही हूँ क्युकी मैं आपको जानना चाहती हूँ कि आखिर आप हैं कौन? कैसे दिखते हैं? आपके दर्शन कहाँ हो सकते हैं?
इन सब का जवाब आप मुझे अगले खत में दे देना..अभी ओर भी सवाल हैं, वैसे तो आपको समय नहीं, इतनी सब चिंताए हैं आपके पास..फिर भी इस खत को पूरा पढियेगा..
बचपन से हमारे यहाँ का हर बालक यही सुनकर बड़ा होता है.."समाज के नियम कायदे".."लोग क्या कहेंगे".."लोगो को क्या जवाब देंगे?"
हर किसी को यही चिंता..सब चिंता में कुछ ना कुछ गलत ही कर बैठते हैं..सब झूठ बोलते हैं..सब फरेबी हैं..सबके दोगले चेहरे हैं..भीतर है प्यार,ख्वाहिशें, सपने, खुलकर जीने की तमन्ना, दूसरों की मदद जर्ने की इच्छा..बंटकर खाने का मन..
और बाहर..पूछिए मत..सिर्फ रोक-टोक, मन को मारना, इछाओ को दबाना..झूठ बोलना, चोरी करना,,खूब सारा पैसा इक्कठा करके शान दिखाना..लोगो से वाहवाही लूटना..(जो मिलती नहीं.)..द्वेष भावना, तिरस्कार ...आदि आदि..

जब सब बुराइयों और कुरीतियों की जड़ है ये समाज शब्द ..जिसे शुरुआत में मनुष्य को एक सामाजिक, मिलनसार और पूर्ण रूप से इंसान बनाने के लिए पैदा किया गया था..उस शब्द के सहारे ना जाने कितनी कुरीतियाँ और बुराइया पनपती रही..हर कोई भुगतता रहा, हर कोई तिल तिल मरता रहा..सभी को इंसान चाहिए था..पर कौन करे इंसान? कौन परिभाषित करे इस "समाज" को? अरे नहीं! मैं आपको जिम्मेदार नहीं कह रही हूँ....आप सोये रहते हो और आपका नाम लेकर लोग लूट पात करते हैं...जैसे पहले जागीरदारो के समय होता था...
कौन कहे कि "यह हमारा समाज है..हम इसे मैला नहीं होने देंगे..कुरीतियों से हमारे समाज को गन्दा करने का किसी को कोई हक नहीं..."
जब ये सवाल उभरे मन में तो विचलित मन को कोई जवाब ना सूझा..बात ये हैं, कि यह निर्बोध मन इतना ही नहीं जनता कि समाज कौन है? किसके पास जाऊ कहने कि लोग आपका नाम लेकर बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं..और इतने धो चुके हैं कि गंगा भी मैली हो गई और आपका  नाम भी..तभी फैसला लिया आपको यह खत लिखने का ...
जिस नारी कि पूजा होती थी मेरे देश में..जिस नारी के एक क्रोध भरी नजरो से भस्म हो जाते थे राक्षश, सूख जाती थी नदियाँ...उस नारी का यह हाल?
और फिर किस मुह से कहते हो  कि तुम परम्पराओ का पालन कर रहे हो, इसलिए पाबन्दी लगा रहे हो...किसी की जिंदगी के फैसले लेने का हक तुम्हें किसने दिया? क्युकी तुम बलवान हो या क्युकी तुम ऐसा करके सभी लोगो का आदर पाना चाहते हो?
नारी को धिक्कारा..चलो ठीक है..नारी तो धरती है...समा ली तुम्हारी सारी बुराइयां अपने भीतर...(इस कार्य में कुछ स्त्रियां भी शामिल हो सकती हैं, अतः यह नारी पुरुष की लड़ाई पर आधारित नहीं है यह बात)...
तो अब बात बच्चो की...
किसने हक दिया तुम्हें उस कच्ची उम्र में उनका बचपन छीनकर उनका ब्याह रचाने का..?
अगर देखभाल करना  इतना भारी लग रहा था तो क्यों पैदा किया..? अपने आनंद के लिए तुने उसे पैदा किया और अब तू उसे अपना गुलाम बनाकर उससे नौकर की तरह हर बात मनवाना चाहता है..? तू तो अभिभावक बनने के लायक भी नहीं था...(उन सभी माता -पिताओ के लिए जो अपनी सोच जबरदस्ती थोपते हैं और ये दुहाई देते हैं की हमने तुम्हें पैदा किया)
चलो बालकों की छोडो,..
जीवन का आधार, इंसानियत का सबसे कीमती गुण "प्रेम"
तुमने तो इस पर भी रोक लगा दी...तुम्हारा ये दोगलापन मुझे समझ नहीं आता ...स्त्री का पति मर गया तो उसकी शादी बिना मर्जी जाने उसके देवर से करवा दो, और यदि शादीशुदा होते हुए उसे किसी और से प्रेम हो गया या वो अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती , दूसरा विवाह करना चाहती है..तो उसका सर मुंडवा कर उसे निर्वस्त्र कर दो कि समाज के खिलाफ है.. इसे मैं क्या समझू?
किसी भी नियम , कायदे-कानून के पीछे कोई व्याख्या नहीं...बस अपने हिसब से तोडा..जो जितना बलवान था , उसकी बात मानी, और बन गए समाज के नियम..
तुम किसी मंदिर में जाकर किसी भगवान कि पूजा के लायक नहीं हो..तुम्हारी इस जिद की वजह से रोज इंसानियत शर्मसार होती है...भगवान शिव सती के विवाहिता थे, किन्तु दूसरा विवाह किया पार्वती से, क्यों ?
क्युकी उन्हें पारवती से प्रेम था.सती अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव की विवाहित बनी...क्यों? क्युकी उन्हें भगवान शिव से प्रेम था...तुम्हारे नियम के अनुसार भगवान शिव और माता सती भी गलत थे?
यदि नहीं तो इस दोगलेपन का जवाब चाहिए मुझे..
मैं एक जीता जागता इंसान हूँ, मुझे भी पूरा हक है अपनी समझ के हिसाब से फैसले लेने का..
सभी इंसानी रिश्तों से परे तुम तो राक्षश बन चुके हो..
इस कलयुग में भगवान के अवतार लेने की उम्मीद नहीं है....और इंसान को ये नेता और कानून कुछ करने नहीं देगा..वोट तो ये समाज ही दिलवाता है ना..
फिर भी मैं अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने के लिए प्रतिबद्ध हूँ..और आपका किसी तरह का कोई दबाव मुझे स्वीकर्य नहीं होगा...

इसी समाज में रहने वाला प्राणी..

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

बेटी नहीं बेटा है तू




मेरी  बेटी  नहीं बेटा है तू",  "मुझे मेरे माँ- पापा ने बेटे की तरह पाला है!"ऐसे ही शब्द मुझे आजकल रोज सुनने को मिलते हैं, और सोचने पर मजबूर हो  जाती हूँ कि 

क्या बेटियां बेटी बन कर नहीं रह सकती? क्यों उन्हें या तो कैदी बनाया जाये या बेटा बनाया जाये? मैं अक्सर पढ़ती हूं, कि हमारे यहाँ औरतो की  बहुत क़द्र होती थी!

बिना घूँघट के रहती थी,पूजा जाता था  उन्हें स्वयंवर रचाने तक का भी हक था!
विदुषियाँ होती थी, अपने आप में सम्पूर्ण..तभी तो ऐसी तेज युक्त संतान पैदा करती थी..और स्रष्टि व समाज सब साफ़ रहता था...मैं अपवाद की बात नहीं कर रही हूँ यहाँ..


फिर एक वक़्त आया,जब उन्हें घूँघट में कैदी बना दिया गया!नौकर की तरह रखा जाने लगा! सारे हक छीन लिए गए...न पढाना, न खुद का वर चुनने की आजादी, और न ही अपनी कोख में पली संतान के विषय में कोई भी फैसला लेने का हक..पुरुषों में सब कुछ अपने ही हाथ में ले लिया..ऐसे में पुरुषों ने कौन से परचम लहरा दिए? पूरी सामाजिक व्यवस्था ही गड़बड़ा गयी...

और अब तो प्रकृति को ही ललकार दिया, बेटी को बेटा बना दिया .और अजीब बात तो ये है, कि बहुत ख़ुशी होती है बेटियों को जब पापा कहते है, "बेटा है मेरा ये" मुझे तो ये शब्द बिलकुल पसंद नहीं है , बेटी हूँ, बेटी ही कहिये..मेरा अपना वजूद है, प्रकृति ने दोनों को अलग बनाया है! मैं बेटा नहीं बनाना चाहती! मैं खुश हूँ कि मैं आपकी बेटी हूँ, और बेटी बनकर ही नाम रोशन करुगी.


क्यों हमारा समाज बेटी को बेटी बनाकर नहीं रख सकता और बेटे को बेटा?.या यूँ कह लो कि क्यों पुरुष, पुरुषत्व नहीं दिखलाता, और नारी नारीत्व..? क्या वाकई में,बेटियों को बराबर खड़ा करने के लिए बेटे शब्द का सहारा लेना जरुरी है..? क्यों कहते हैं, कि आजकल तो लड़कियां लड़कों से आगे हैं? आगे जाकर करना क्या है? क्यों आगे जाने की होड लगी है दोनों में? दोनों एक ही गाडी के दो पहिये हैं,लड़की लड़की बनकर रहे

और लड़का लड़का ही रहे! तो फिर क्या उन्नति नहीं हो सकती?


जब तक बेटी में बेटी नहीं होगी,या एक पत्नी में पत्नी नहीं होगी?तो कैसे ये गाड़ी चल पाएगी? मुझे डर ये है कि कही येदोनों अपना अलग संसार ही ना बसा ले! उत्तरी छोर पुरुषों का, दक्षिणी महिलाओं का..या फिर इसका उल्टा भी हो सकता..उत्तरी महिलाओं का, दक्षिणी पुरुषों का..और वैसे भी विज्ञानं ने इतनी तरक्की तो कर ही ली है कि वंश को आगे बढ़ाने में कोई दिक्कत नहीं होगी..है न? आप हंसिये मत, दोनों की प्रतिस्पर्धा अगर ऐसी ही रही तो यही होने वाला है!


ये कहते हैं,कि लड़की लड़का हैं! ठीक है,  फिर क्यों उस लड़के को बस में सीट की जरुरत होती है? बाकी लडको की तरह खड़े नहीं हो सकती ?तब कैसे आप झट से कह दोगे, महिला है बेटा, सीट दे दे!अधिकार की बात हो तो हम बेटियां हैं,और वैसे हम बेटों से आगे हैं! यहाँ मैं ये बिलकुल नहीं कह रही कि नारी बराबर नहीं है..लेकिन ये आगे, पीछे, बराबर की लड़ाई मेरी समझ से परे है...
और ये महिला मोर्चा वालों से तो मैं यही कहूँगी, ये तो वही बात हो गई कि माँ लाठी लेकर कहे कि मैं माँ हूँ, मेरी पूजा कर...बस में सीट दिलाने की बजाय नारी को खड़ा होना सिखाइये,, उससे कहिये कि समाज में अपना स्थान न छोड़े..पूजा करवानी है तो देवी बने,,किन्तु सशक्त ताकि पीछे कई बरसो से जो शोषण हो रहा है, उसके बारे में पुरुष सोचे भी न..और कम से कम अपनी संतान को ( बेटा या बेटी) उसके प्राकृतिक गुणों से परिचित तो करवा ही दें,,,सिखाना तो आपकी मर्जी है..
दोनों का एक दूसरे के मन में सम्मान होना जरुरी है...दोनों अपना अपना काम करें,,,और ये होड आगे निकलने की, उसे छोड दे..इससे कुछ हासिल नहीं होगा...बस स्थिति और बिगड जायेगी...

आपके विचार सदर आमंत्रित हैं...:))


copyright गुंज झाझारिया

शुक्रवार, 29 जून 2012

मेरी पूजा का कोई फल नहीं मिलता

जब सामने वाले मंदिर में आरती करने पंडित उठते हैं..
मैं उनसे पहले ही उठ खड़ी होती हूँ..
वो पूजा की तैयारी करते हैं,
और मैं इनके दफ्तर जाने की....
जब उनकी आरती की घंटी बजती है..
मैं इन्हें उठा रही होती हूँ..
वो प्रसाद बांटते हैं..
मैं नाश्ता करवा रही होती हूँ...
जब पंडित मंदिर की सफाई में जुटते हैं.
मैं घर आंगन की सफाई में जुटी होती हूँ..
जब वो १२ बजे मंदिर के पट बंद करते हैं..
मैं तब भोजन कर थोडा लेट पाती हूँ..
फिर पंडित जैसे ही ३ बजे की घंटी बजाते हैं,
मेरे बच्चे स्कूल से आ जाते हैं...
जब पंडित कुंडलियाँ देखते हैं...
मैं बालको का सेवा पानी करती हूँ,,
मेरा भविष्य तो वही है न..
फिर शाम की आरती होने लगती है,
और ये दफ्तर से आ जाते हैं..
फिर होड लगती है
मुझमे और मंदिर के पंडित में
किसकी भक्ति में ज्यादा शक्ति .
हर रोज न जाने कौन सी चूक हो जाती है
जो मेरे मंदिर के स्वामी क्रोधित हो जाते हैं..
रात का नजारा थोडा अलग होता है...
मंदिर के पंडित जब चैन से १० बजे सो जाते हैं..
मैं उनके हाथो से मार खा रही होती हूँ..
कितने पढ़े लिखे और ज्ञानी होते हैं ये पंडित..
इनकी पूजा से कभी स्वामी को क्रोध नहीं आता,
बस सुकून की बौछार होती है..
मैं अबोध हूँ..अज्ञानी हूँ..
जो मेरी पूजा का कोई फल ही नहीं मिलता...
Copyright ©गुंज झाझारिया

गुरुवार, 28 जून 2012

भूल मत जाना

"प्रिये!
विश्वास की डोर से संबंधो को बांधने का सोच रही थी, 
किन्तु देखो न! ये धागे उलझ गए हैं...
कितनी कोशिश की, जब से इसी में लगी हूँ...!
तुम थोड़ी मदद कर दो न?
तुम्हे देर नहीं होने दूंगी, बाकी के काम मैं कर दूंगी..
मुझे पूरा विश्वास है कि तुम जरुर सुलझा दोगे..."

"अरे यार! तुम भी न..
सुबह सुबह क्या काम लेकर बैठ गयी..
शाम को देखूंगा वक्त मिला तो कर दूँगा...
अभी मन नहीं है...."

"लों, अब क्या करोगे शाम को.."

"क्या हुआ?"

"गांठ लग गयी थी, एक तरफ से खिंचा तो टूट गया धागा.."

"प्रिये!
काश तुम थोडा सा वक्त निकल लेते ..तो मेरी मेहनत पर पानी न फिरता..
बाकी तो सब मैंने कर ही दिया था..तुम्हे बस हाथ ही तो लगाना था..
चलो कोई नहीं..शाम को आते वक्त एक धागों का गुच्छा लेते आना..
अभी तुम्हारी जर्सी अधूरी ही हैं.!!
भूल मत जाना, नहीं तो जब पूरी होगी तब मौसम ही निकल जाएगा इसे पहनने का,
फिर तकते रहना बैठे बैठे....."
copyright ©गुंज झाझारिया

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

सजती रात में जंचता चाँद---भाग 2

सजकर आते देख,
क्यों तूने सजना छोड़ दिया...
प्रसंशा करता तू भी,
इसके शीघ्र सज कर आने की...
किन्तु कैसे भूल गया वो शब्द?
कैसे नाकारा निरंतर गूंजते साज को?
जो कहता रहा--
सजना है तुझे,
सजना है तुझे,
सुन्दर ----अतिसुन्दर---सर्वसुन्दर!

अरे भैया!
पहले सज नहीं पाए तो दुखी हो गए!
यहाँ प्रतिस्पर्धा तो सबसे सुन्दर सजने की थी!
सबसे पहले सजने की नहीं!
जब कूदे थे इस सजने की दौड़ में 
तब क्यों ना सजने का पूरा नियम पढ़ा!
गलती हुई है,
अब सजा भुगत रहे हो!

लेकिन अब याद दिला दूँ मैं...
सजने की प्रतिस्पर्धा अब भी चल रही है,
और लोगो का सजना जारी है!
सजने के सामान की कमी नहीं है तेरे पास अब भी!
और अब भी  उद्देश्य वही है!
सजना है तुझे,
सजना है तुझे!
सुन्दर--अतिसुन्दर---सर्वसुन्दर!
यहाँ सबसे पहले सजने की कोई होड़ नहीं है!

गूंज झाझारिया --

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

सजती रात में जचता चाँद

सजाने चले थे,
सजने के बहाने !
सजना ना आया !!
सजाना कैसे आता?

ना सज पाए,
ना सजा पाए!
इसी बीच कोई और सजकर निकला यूँ,
जैसे
सजती रात में जंचता चंद्रमा हो!
उसको सजकर आता देखा तो,
जिसको सजाने चले थे ,
उसकी उलाहना ही मिल गई!

अरे भैया!!
कह दिया होता--
खुद सजने आये थे तुम्हे सजाने के बहाने!
तुम्हे सजाना तो कभी मकसद नहीं था मेरा!
जितना दुःख तुम्हे है,
उससे ज्यादा दर्द यहाँ हैं!

जो खुद का ना सजा पाया ,
उससे बड़ा बदसूरत कौन होगा!
ये पंक्तिया लिखी और जीवन का एक अद्भुत सत्य सामने आया...
आज पहली बार अपनी कलम की प्रसंशा करने का मन  हुआ!
मेरे कुछ हिंदी में कमजोर दोस्त शायद यहाँ लिखी पंक्तियों में छिपा रहस्य नहीं समझ पाए!
सोचा क्यों ना उनके लिए थोड़ी व्याख्या कर दी जाए सरल हिंदी में!
वैसे भी स्कूल में मुझे हिंदी और संस्कृत की अध्यापिका से व्याख्या के मामले में काफी प्रसंशा मिलती थी! :P
हाँ तो एक बालक जब पैदा होता है, तो भगवान् उसे तन-मन-बुधि देता है...
और कहता है की "लो, सजने के लिए सारी सामग्री दे दी है! इसका उपयोग करो और सुन्दर ----अतिसुन्दर----सर्वसुन्दर बन कर दिखलाओ!"
लेकिन उसके पैदा होने के साथ ही ना जाने कितने सगे-सबंधियो, मित्रो, भाई-बहनों को लगता है कि ये हमें सजाने आया है!
हमारा मान बढ़ने आया है!
चलो कोई नहीं बहाना उन्हें सजाने का रहता है, लेकिन इसकी आड़ में में वह स्वयं को ही सजाने का प्रयत्न करता है!

{अच्छा जी ---अब आप कहोगे जब व्याख्या ही कर रही हो तो ये सजना या सजाना है, इसका अर्थ तो बतलाओ!
ये तो आप ही जानो कि आप क्या सजाना चाहते हो, और क्यों?
हर एक के लिए इस सजने की अलग परिभाषा है!}

अब देखिये---अगर हम ना सज पाए, उससे पहले कोई और सज कर निकल गया तो---सभी रिश्तेदार, माँ-पापा, भाई-बहन कहेगे-अरे तुमने ये नहीं किया? हमारा मान गिरा दिया! तुम इतना नहीं कर पाए? और उलाहना देंगे ! तो 
जवाब देना---अरे भैया!!
कह दिया होता--
खुद सजने आये थे तुम्हे सजाने के बहाने!
तुम्हे सजाना तो कभी मकसद नहीं था मेरा!
जितना दुःख तुम्हे है,
उससे ज्यादा दर्द यहाँ हैं!

आखिर में दो पंक्तियाँ--

शायद इन्हें समझाने की जरुरत नहीं पड़ेगी---
जो खुद का ना सजा पाया ,
उससे बड़ा बदसूरत कौन होगा!?
उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि अप सब को समझ आया होगा!

इसी लेख के ख़त्म होने के साथ सारे बादल भी उड़ गए!
अब आसमान साफ़ नजर आ रहा है!

धन्यवाद!

गूंज झाझारिया





गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

मर्जी काम की

आप सभी को नमस्कार!

अक्सर देखा और महसूस किया है कि, जिंदगी को हम जैसी दिशा दे देते हैं!
वैसी ही राह पकड़ लेती है!
कभी कभी तो ये अपने हाथ की कठपुतली लगती है, अगले ही पल में लगता है कि इसका रिमोट ऊपर वाले के हाथ में हैं!
लेकिन ऊपर वाले के हाथ में कैसे? ये हज़म नहीं होता!
हाँ, आपके आस-पास रहने वाले लोगो का प्रभाव होता है!
अभी पल्लवी जी का भी एक इसी से मिलता जुलता लेख आया था-जिसमे उन्होंने उल्लेख किया था "कुछ तो लोग कहेंगे"!
तो अक्सर उनके कहने और करने का प्रभाव हमारे जीवन पर अवश्य पड़ता है!

अभी आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं बात किस विषय पर कर रही हूँ? जिंदगी की दिशा या दुसरो का प्रभाव...

जी नहीं, मैं तो अपने ही कर्मो की बात कर रही हूँ....मैं बात कर रही हूँ एक ऐसे अवगुण की, जो हर दुसरे इंसान में होता है! एक किस्सा सुनती हूँ!
अभी-२ २ महीने पहले नए घर में रहने आई हूँ! यहाँ हमारे ऊपर के फ्लैट में एक आंटी रहती हैं!
 दिल की साफ़ हैं और मुझसे काफी अच्छे से बात भी करती हैं!
लेकिन अक्सर वो मुझसे शिकायते करती रहती हैं, कभी अपने पतिदेव की , कभी सासु माँ की,
कभी ननद की या फिर पड़ोसन की!उनके पास सिर्फ यही बात होती है! मैं अपनी तरफ से कोशिश कर चुकी कई बार उन्हें समझाने की कि ऐसी बाते कर के वो अपने अन्दर इतनी नकारात्मक उर्जा भर चुकी हैं कि यदि कोई कुछ अच्छा करता भी है तो उन्हें दिखाई नहीं देता! उस समय तो वो समझ जाती हैं! लेकिन अब लगता है ये उनकी आदत हो गई है!

उन्हें अक्सर जो समस्या रहती है वही है--हर दुसरे आदमी की समस्या !
जी हाँ मैं उसी की बात कर रही हूँ...
वो ये है कि पहले तो वो दुसरो का काम कर देती हैं, बिना कहे सहायता कर देती हैं, या यूँ कहो जबरदस्ती कर देती है ! और फिर जब सामने वाला उनका कोई काम न करे तो उनका दिल दुखता है---
"मैंने तो उसका इतना किया, उसने मेरे लिए क्या किया?" 
अरे भाई! ये क्या बात है?
तुमसे हुआ तो तुमने किया! अगर ये सोच के किया था कि चलो अब इसे मेरा काम करना ही पड़ेगा तो उससे गलत तो आप हो!
और अगर ऐसा सोचा नहीं था तो फिर अपने किये कराये को बोल बोल कर क्यों बर्बाद करते हो?

मुझे लगता है कि इससे तो अच्छा है--न किसी का करो, न किसी से करवाओ!
लेकिन ऐसे लोगो का क्या , जिनसे न करवाने पर भी कर देते हैं! और उसे अहसान समझकर हावी हो जाते हैं!
सामने वाला कुछ न कर पाए तो उसे बुरा-भला कह दो!

मानती हूँ कि हम समाज में रहते हैं और एक-दुसरे की मदद करनी चाहिए!! किन्तु ये तो सबकी मर्जी है कि वो कोई काम करना चाहे या न करना चाहे---कोई कैसे उससे जबरदस्ती करवा सकता है? और फिर आप ये कहो कि--"कर देता तो उसका क्या जाता?"
ये गलत है!

यह विषय बहुत छोटा है, किन्तु अक्सर मैंने लोगो को घर में, चाहे वो पति-पत्नी हों या सास-बहु, माँ-बच्चे, सबको इस काम के विषय पर लड़ते देखा है!
"ये काम तुम्हारा किया , तो क्या तुम इतना नहीं कर सकते?"

प्यार से ऐसी बाते हो तो आनंद आता है, लेकिन इस विषय पर लड़ाई का कोई ओचित्य ही नहीं है!
क्युकी हम सब बुद्धिजीवी हैं, और अपने दिमाग से सोचकर ही सब करते हैं! और अगर दिल नहीं किया तो नहीं करते हैं! फिर उस बात को कोई थोप नहीं सकता!

आपके विचारो का स्वागत!

गूंज झाझारिया!








मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

छवि सुधारने की जंग

अभी कल एक फेसबुक दोस्त ने कहा की आपको इस तरह मॉडल की फोटो अपने प्रोफाइल पर नहीं लगानी चाहिए, गलत छवि बनती  है...!
अब बैठकर सोच रही हूँ कि ऐसा आखिर क्यों होता है?
"मैं अच्छा लिखती हूँ,
मेरी सोच साफ़-सुथरी है!
मैं अपने अलावा देश की मौजूदा समस्याओ पर भी सोचती हूँ..
और एक युवा नागरिक होने के कर्तव्यो का पालन भी करती हूँ...!"

इन सब बातो को साबित करने लिए जरुरी है कि  मैं सिर्फ ऐसी चीजों का इस्तेमाल करूँ, जो मेरी पुरानी पीढ़ी करती थी.?
क्या मेरी सोच दिखाने के लिए मुझे खादी पहनना,या साडी पहनना जरुरी है?

लेकिन मेरे विचारो का क्या?
मैं तो उन मोडल्स का , अदाकारों का , सभी फिल्म निर्माताओ का भी आदर करती हूँ,
उनकी प्रशंसा करती हूँ...
बहुत कुछ सीखा  है मैंने उनसे भी!

ये वही लोग हैं, जो समाज के हर रूप-रंग को आपके सामने रखते हैं!
गन्दगी ये लोग नहीं फैलाते!
ये तो आइना हैं, हमारा!
बस हम लोग वो आइना देख नहीं पाते और आग-बबूला हो जाते हैं कि गंदे दृश्य दिखाकर ये लोग हमारे समाज को गन्दा कर रहे हैं! किसी फिल्म के आने पर जिसमे कुछ ख़राब दृश्य हैं, (आपके हिस्साब से, मुझे लगता है, वो मानवीय जीवन का हिस्सा हैं, और उन्हें छुपाना एक अदाकार के अदाकारी का अपमान है! उसके लिए जरुरी है कि वो अपने किरदार को जिवंत कर सके) शिव-सेना, और हिन्दू-समाज , और न जाने कितने समाज मारने-पीटने पर तुल जाते हैं,
हमारे देश कि सचाई है ये, इससे क्या घबराना?
जब बलात्कार का प्रतिशत रजिस्टर्स , और फाइल्स में बढ़ता रहता है,
जब सड़क किनारे यूँ नग्न शरीर देखने को मिलते हैं,
तब क्यों नहीं कोई समाज आता है, दोषियों को दंड देने?

जब दोषियों को तारीखे बढाकर, मामला ठंडा होने पर रिहा किये जाने पर कोई नहीं बोलता...?
लेकिन जब वही सच्चाई निर्माता दिखाए तो वो गलत है?

मेरा तो कहना है की अगर सच्चाई से जीना सीखना है ,
तो सभी राजनेताओं को, सभी पुलिस वालो को,
और सभी मीडिया वालो को , सीखना चाहिए उनसे!

जहा तक कपड़ो की बात है,
क्यों फैशन गलत है?

मैं जिन्दा हूँ,
मेरे अन्दर इंसान होने के सारे गुण हैं,(अवगुण भी)
मुझे रंग अच्छे लगते हैं,
मुझे भी अच्छा दिखना है!

इन सब बातों का मेरी छवि से क्या मतलब?

एक और उदाहरन दूंगी---आप, मैं या कोई भी हमारे बीच में ऐसा है? जो ये कह सके कि
मैं जो हूँ, मैं वो हूँ! मुझे कोई पछतावा नहीं आजतक मैंने जो भी किया उसका.
और फिर अपनी जीवन कि हर एक सच्चाई पुरे देश के सामने टीवी पर कह सकते हो?

ये किया है---पोर्न-स्टार ----सनी ने बिग बॉस पर!

वो उसका पेशा था,
लेकिन असली जिंदगी में उससे बहुत कुछ सीखा मैंने!
इतनी साफ़-सुथरी सोच, इतने मेहनती और इतनी ईमानदार !

आखिर में मेरा यही कहना है कि
अपने लिए ईमानदार बनो पहले!
सबसे ज्यादा जरुरी है!

[हो सकता है भावनाओं में बहकर शायद कुछ-एक बात मैंने गलत कह दी हों,
और आप -सब उससे सहमत न हो,,
उसके लिए क्षमा ...आपके विचारो कि सख्त जरुरत है सही राह के लिए]

धन्यवाद..

गूंज झाझारिया




सोमवार, 28 नवंबर 2011

आलस्य :मेरा दोस्त

आज सुबह मैंने पूछा आलस्य से,

" भाई, तुम क्यूँ मुझे इतना सताते हो?
हर समय बिन बुलाये मेहमान के जैसे आस-पास
मंडराते हो!
मुझे नहीं पसंद है यूँ तुम्हारा आना,
तुम्हारे आने से ही तो मेरे काम अधूरे रह जाते हैं!
मेरे नाम न कमाने की,
धन न पाने की एक-मात्र वजह तुम ही हो!"

आलस्य पहले तो खूब हँसा!
उसे हँसता देखकर 
तो मानो मेरा खून खौल रहा था!

आलस्य हँसा और बोला-
" लड़की, तुम कितनी सयानी हो!
मेरी तो प्रकृति है, हर समय सभी के
आस-पास रहने की, मौका तलाशने की !
ताकि
मनुष्य को आराम के पल दे संकू!
क्युकी लालच में तो मनुष्य भूल ही जाता है,
कि उसे थोडा सा विश्राम करना है!
पैसे की भूख और नाम कमाने की चाह
में वो अपने तन को भूल ही जाता है!
इसलिए मैं तो तुम्हारे भले के लिए आस-पास रहता हूँ!
मुझे क्यों इतना बुरा-भला कह रही हो?

अच्छा ये बताओ,
जो लोग इतना धन कमाते हैं,
रात -दिन कर्म करते हैं,
मैं क्या उनके आस-पास नहीं मंडराता?"

आलस्य के इस सवाल ने मुझे थोडा सोच में डाल दिया!
क्या कहूँ?
और वाकई में उनके आस-पास आलस्य रहता है या नहीं ?
मैं इससे अनजान सी होकर बोली--
" तुम उन लोगो के पास तब जाओगे न,
जब तुम्हे मुझसे फुरसत मिलेगी!
रात-दिन तो यही पैर पसारे रहते हो!"

आलस्य को थोडा क्रोध तो आया,
किन्तु उसे सँभालते हुए बोला--

"देखो लड़की,
मेरी प्रकृति के अनुसार मैं हर एक मनुष्य,
यहाँ तक की हर एक जानवर के आस-पास भी रहता हूँ!
लेकिन तुम इंसान हो ही ऐसे
जिन्हें हर एक चीज़ का लालच हो जाता है!
धन आने लगेगा तो उसका लालच और
सो जाओगे तो आराम का लालच!
इसमें भला मेरा क्या दोष?
जो इंसान मुझसे दोस्ती करके ,
मेरा साथ देते हैं,
और मुझे समझाते हैं कि
बाकी के काम भी जरुरी हैं!
वो लोग खूब धन कमाते हैं,
खूब कर्म करते हैं!
तुम्हारी गलती है कि
तुम मुझे आवश्यकता से ज्यादा चाहती हो!

| अति सर्वत्र वर्ज्यते|

मैं तो अपना काम करता हूँ!
किन्तु तुम क्यों मुझसे इतना प्रेम करती हो?
तुम क्यों मेरे आने पर मेरी और आकर्षित होती हो?


इतना बड़ा सत्य सुनकर
मेरी आँखों से आंसू आ गए!
मैंने कहा--
" तो फिर तुम ही बताओ,
मैं तुम्हारे आने पर अपना काम करती रहूंगी,
तो क्या तुम्हारा अपमान नहीं होगा?
मुझसे आये अतिथि का अपमान नहीं किया जाता!"


मुझे रोता देखकर
आलस्य को थोडा अपने क्रोध पर मलाल हुआ!

और बोला--
" देखो तुम रोना बंद करो,
मैं तुम्हे एक बात बताता हूँ,
मैं -आलस्य कोई मेहमान नहीं हूँ..
मैं तो तुम्हारा एक ऐसा दोस्त हूँ,
जो हर समय तुम्हारे साथ रहता हूँ..
अतः तुम्हे किसी प्रकार का संकोच करने की
आवश्यकता नहीं है!
जब भी तुम काम में लगी रहोगी,
मुझे कहना इंतज़ार करने को,
मैं इंतज़ार करूँगा,
जितना तुम कहोगी,
किन्तु जो समय है न,
वो तुम्हारा दोस्त नहीं है, जिसे तुम अपना दोस्त कहती हो!
वो तुम्हारा इंतज़ार कभी नहीं करेगा!"

बड़ा ही आश्चर्य हुआ इतना बड़ा सत्य जानकर!
मैंने कहा...
"आलस्य तुम सही कह रहे थे
कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ..
और अब ये सब सुनकर तो और करने लगी हूँ..
सही कहा कौन ऐसा सच्चा दोस्त होगा,
जो जितना कहोगे-इंतज़ार करेगा!
तुम वादा करो कि तुम हमेशा मेरे काम खत्म होने तक इंतज़ार करोगे!"

आलस्य ने मुझे गले लगाया और कहा--
"अब जाओ नहीं तो बातो में तुम्हारा काम फिर अधुरा रह जाएगा!
बची हुई बात तो हम आराम के समय में ही कर लेंगे!"

:)
और मैं काम करने चली गई!


Gunj Jhajharia



सोमवार, 21 नवंबर 2011

सामाजिक प्राणी

अजीब दुनिया है...
आप सब लोग समझते होगे कि इतने लेख लिखती हूँ, तो मुझे सब दुनियादारी समझ ही आती होगी!
पर इस दुनिया को और यह के लोगो को समझना इतना आसान कहा है?
छोटी सोच और तुच्छ विचारो को हमारे समाज से ये शिक्षा भी दूर नहीं कर पायी है!
अगर इन सब संकरे विचारो के दायरे से बहार निकल जाते तो आज ये हालत न होती हमारे समाज की.
और जो कोई इन सब से ऊपर उठाना चाहता है, उसे न ही बल्कि रोका जाता है, खीच कर अपने स्तर तक लाने में 

कोई कसार नहीं छोड़ी जाती!

अगर गलत को गलत नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए?
मुझे तो ये समझ नहीं आता कि लोग लड़ाई को बढाकर उसे राइ का पहाड़ क्यों बनाते हैं?
क्यों उसे बैठकर, समझ कर सुलझा नहीं सकते?
किसी महापुरुष ने ठीक ही कहा है कि क्रोध बूढी को भ्रष्ट कर देता है!

चिलाना, चीखना या फिर जब मन आये कुछ भी कह जाना, सामने वाले के सम्मान और प्रतिष्ठा की बिना कुछ चिंता किये! और फिर अगली बार उसी इंसान से आचे व्यवहार की उम्मीद करना! क्या यह सही है?
क्या किसी की गलती का यही हल है?
क्या हम उसे आसान, सीधे शब्दों में उसकी गलती बता कर उसे अत्म्गलानी के लिए नहीं छोड़ सकते?
कि उससे वह भूल फिर से न हो!
क्या वास्तव में गुस्सा होने से हमारी समस्या का हल निकल जाएगा ?

हाँ, ये भी बात है कि कुछ लोग होते हैं, जिन्हें शांत करने के लिए आपको कड़ी भाषा अपनानी पड़ती है, किन्तु वह बचाव होता है! अगर वह लोग पहले ही समझ जाए कि बस अब मैं अपनी बात कह चूका, हावी होने से कोई हल नहीं निकलेगा, तो फिर हमें वह कड़े शब्द बोलने ही न पड़ेंगे!


आप सब सोच रहे होंगे कि आज अचनक मैं  यह समाज की छोटी सोच और क्रोध की बात क्यों कर कर रही हु?
तो इसका जवाब ये है कि, कल ही मैं अपने पैत्रक शहर आई हूँ, अपने परिवार के सदस्यों से मिलने!
यहाँ आकार हेमशा अहसास होता है कि चाहे कितनी भी विद्या हमारे गावो में पहुच गई हो, कित्नु वो सिर्फ रतन विद्या ही है, जिसका वास्तव में कोई अर्थ नहीं निकलाकर आता!
अभी भी लोग उठाना, बैठना, और किसी से कैसे व्यवहार करना है? नहीं सीखे हैं!
अभी भी किसी की कही एक बात को पकड़ कर सर फोड़ने की नौबत आ जाती है, ये जाने बिना कि क्या वास्तव में सामने वाला यही कहना चाहता था?
आज भी जब कोई अच्छी बात बताई जाए, इसे लोग "शहरी  चोचले" कहते हैं!

यहाँ आई तो ऐसे ही कुछ समझाए बिना रहा न गया!
भाई को कुछ बोला तो बिना मतलब जाने चिल्लाना शुरू हो गया कि " तुझसे बड़ा हूँ, ज्ञान न दे!" ज्यादा जानता हूँ! और फिर उस बात को इतना बढ़ा दिया कि मेरे पास समझाने और बोलने को कुछ न रहा!
और जब मैं चुप रही तो बाकी सब को लगा कि मेरी ही गलती है !
और सब मुझ पर बरस पड़े कि बड़ो से बात करने कि तमीज नहीं है!

तो ये था हादसा !
छोटी सोच और सकरे विचार इसलिए कहा
क्युकी , आज भी उन्हें लगता है कि अगर मैं बड़ा हूँ, तो मुझे सब आता है, मैं परम ज्ञानी हूँ!
अरे ! ये भी भला कोई जवाब हुआ?
क्या अपने से छोटी उम्र के लोगो से नहीं सिखा जा सकता? इससे बद्दापन कम नहीं होता!
क्या अगर आपकी कंपनी का C.E.O. आपसे छोटा है तो आप उसे ये कहोगे कि इसे क्या पता ? मैं इससे बड़ा हूँ, ज्यादा दुनिया देखी है!
आज भी वो लोग समाज के कहे चलते हैं!
यहाँ मैं ये नहीं कहती कि समाज के हिसाब से चलना गलत है!
मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज में रहना और उनके हिसाब से चलना ही चाहिए!


किन्तु अगर कुछ गलत है तो उसे सही कहने कि हिम्मत भी होनी चाइये!
ये कौनसी बात हुए कि समाज के खातिर अपनी यह अपने परिवार के लोगो की ख़ुशी भूल जाए और घुट-२ कर जिए?
अरे यह समाज हमारा है और हमसे बना है! कोई पत्थर की लकीर नहीं जो मिट नहीं सकती !

मेरी यह कोशिश तो उन्हें समझाने की नाकामयाब रही और उल्टा मुझ पर ही आरोप आये कि,
मुझे बड़ो का आदर करना नहीं आता और शहर के लोगो जैसे गुण आ गए हैं, जिन्हें समाज और अपनों से कोई लेना-देना नहीं होता!

लेकिन फिर भी हमेशा कोशिश करती रहूगी, कि अपनी बात उनके सामने रख कर समझा सकू!

आप सब के विचार आमंत्रित हैं!

धन्यवाद आपके बहुमूल्य समय के लिए!

गुंजन झाझारिया




शनिवार, 19 नवंबर 2011

बिग बॉस की सीख


हमारे सामने कोई भी परिस्थिति आये, वो इतनी बड़ी  नहीं होती की हम उसका सामना न कर सके!
हाँ अपनों के जाने का दुख होता है< और होना भी चाहिए, यही एक इंसान की पहचान है, कि वो अपने पराये में फर्क जानता है!

किसी कारणवश अगर कोई अपना आपसे दूर चला जाए तो उसमे उसकी या अपनी गलतिय ढूँढना , बस उसके आने कि आस देखना गलत है!
ये तो बस परिस्थितियों का खेल है, जो हर समय एक जैसी नहीं होती!

आजकल टेलीविजन पर आ रहे बिग बॉस को सब देखते तो हैं, लेकिन मुझे उसे देखकर जो भी समझ आया है वो आपके साथ बाटना चाहती हूँ!

ये बिलकुल हमारे संसार की तरह है, बाहरी दुनिया से अलग...जैसे हमारा संसार!
दोस्त हैं, दुश्मन है.....पर सच में कोई नहीं ,,,और सब हैं!
यहा खेल खेले जाते हैं, छोटा घर हैं, कम लोग हैं,हमारी नजर है,  इसलिए सब साफ़ पता लगता हैं!
पर वही खेल असली जिंदगी में भी खेले जाते हैं!
न हमारी नजर होती है, और न पता लग पाता है, जब तक परिणाम न आये उस खेल का!
आपके हसने, खाने , बोलने, चलने पर हर समय लोगो की नजर रहती है!
वही असल जिंदगी में भी होता है!
प्यार सब करते हैं,,,,पर जहा नोमिनेशन कि बात आये कोई अपना नहीं,
वैसे ही जहा पर असल जिंदगी में खुद की खुशियों का , और आराम का ख्याल आये...कोई अपना नहीं!

मैं तो सही में दात देती हु, ऐसे निर्माताओ की...
अगर चाहो तो इतना कुछ सीख सकते हो,,,
एक कृत्रिम दुनिया बना कर दी है, और बिग बॉस मानो हमारे समाज  के नियम-कायदे, और महापुरुषों की खिची हुए दीवारे हो...
 बिग बॉस के नियम  को मानने और कैमरे के बाहर बसी दुनिया के सामने अच्छा दिखने के लिए वो लोग रोज रूप धरते हैं! तो असल जिंदगी में भी उन्ही नियम-कायदों को अपने हिसाब से मरोड़ने और दुनिया के सामने अच्छा बनने के चक्कर में इंसान नए नए रूप धरता है!

अगर ये बिग बॉस के नियम कायदे न हो, अगर वहां नोमिनेशन का खतरा न हो,
तो निकल कर आएगा सबका असली रूप...मेरे हिसाब से..तब ये रोज होने वाली खिट-२ भी बहुत कम  होगी और अगर होगी तो तुरंत समाधान भी निकल आएगा...

हाँ ,तो अब तक आप मेरी बात समझ ही गए होंगे...
की अगर ये समाज के नियम कायदों की बेडिया न हो, दुनिया के सामने अच्छा बनने का ढोंग न हो...
तो फिर कैसा होगा इंसान...?
तब असली मनुष्य सामने आएगा...तब देखना प्रेम और विश्वास के फूल कैसे खिलेंगे...और तब दुसरो की मदद और उन्नति चाहने से  अपने ही आप में एक सम्पूर्ण समाज बन जाएगा..!

किन्तु ये तो मेरी कल्पना है...ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि मनुष्य अपने आप कि बुधि का इस्तेमाल कर अपने ऊपर बिछाये इस जाल से निकल सके....

तो फिर बिग बॉस से और क्या सिखा जाए?
मेरे हिसाब से हम हर एक वाकये को जिंदगी में असल रूप दे कर अगर मेरे साथ होता तो मैं क्या करता?
ये सोचे तो भी आगे आने वाली कई परिस्थितियों से लड़ने की पहले से तयारी हो जाएगी!!


इन दिनों बहुत कुछ सिखा बिग बॉस से,
सोचा आपके साथ बाट लू...
आशा है आपको पसंद आया होगा!

आपके विचारो  का स्वागत है !

गुंजन झाझारिया