गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

मर्जी काम की

आप सभी को नमस्कार!

अक्सर देखा और महसूस किया है कि, जिंदगी को हम जैसी दिशा दे देते हैं!
वैसी ही राह पकड़ लेती है!
कभी कभी तो ये अपने हाथ की कठपुतली लगती है, अगले ही पल में लगता है कि इसका रिमोट ऊपर वाले के हाथ में हैं!
लेकिन ऊपर वाले के हाथ में कैसे? ये हज़म नहीं होता!
हाँ, आपके आस-पास रहने वाले लोगो का प्रभाव होता है!
अभी पल्लवी जी का भी एक इसी से मिलता जुलता लेख आया था-जिसमे उन्होंने उल्लेख किया था "कुछ तो लोग कहेंगे"!
तो अक्सर उनके कहने और करने का प्रभाव हमारे जीवन पर अवश्य पड़ता है!

अभी आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं बात किस विषय पर कर रही हूँ? जिंदगी की दिशा या दुसरो का प्रभाव...

जी नहीं, मैं तो अपने ही कर्मो की बात कर रही हूँ....मैं बात कर रही हूँ एक ऐसे अवगुण की, जो हर दुसरे इंसान में होता है! एक किस्सा सुनती हूँ!
अभी-२ २ महीने पहले नए घर में रहने आई हूँ! यहाँ हमारे ऊपर के फ्लैट में एक आंटी रहती हैं!
 दिल की साफ़ हैं और मुझसे काफी अच्छे से बात भी करती हैं!
लेकिन अक्सर वो मुझसे शिकायते करती रहती हैं, कभी अपने पतिदेव की , कभी सासु माँ की,
कभी ननद की या फिर पड़ोसन की!उनके पास सिर्फ यही बात होती है! मैं अपनी तरफ से कोशिश कर चुकी कई बार उन्हें समझाने की कि ऐसी बाते कर के वो अपने अन्दर इतनी नकारात्मक उर्जा भर चुकी हैं कि यदि कोई कुछ अच्छा करता भी है तो उन्हें दिखाई नहीं देता! उस समय तो वो समझ जाती हैं! लेकिन अब लगता है ये उनकी आदत हो गई है!

उन्हें अक्सर जो समस्या रहती है वही है--हर दुसरे आदमी की समस्या !
जी हाँ मैं उसी की बात कर रही हूँ...
वो ये है कि पहले तो वो दुसरो का काम कर देती हैं, बिना कहे सहायता कर देती हैं, या यूँ कहो जबरदस्ती कर देती है ! और फिर जब सामने वाला उनका कोई काम न करे तो उनका दिल दुखता है---
"मैंने तो उसका इतना किया, उसने मेरे लिए क्या किया?" 
अरे भाई! ये क्या बात है?
तुमसे हुआ तो तुमने किया! अगर ये सोच के किया था कि चलो अब इसे मेरा काम करना ही पड़ेगा तो उससे गलत तो आप हो!
और अगर ऐसा सोचा नहीं था तो फिर अपने किये कराये को बोल बोल कर क्यों बर्बाद करते हो?

मुझे लगता है कि इससे तो अच्छा है--न किसी का करो, न किसी से करवाओ!
लेकिन ऐसे लोगो का क्या , जिनसे न करवाने पर भी कर देते हैं! और उसे अहसान समझकर हावी हो जाते हैं!
सामने वाला कुछ न कर पाए तो उसे बुरा-भला कह दो!

मानती हूँ कि हम समाज में रहते हैं और एक-दुसरे की मदद करनी चाहिए!! किन्तु ये तो सबकी मर्जी है कि वो कोई काम करना चाहे या न करना चाहे---कोई कैसे उससे जबरदस्ती करवा सकता है? और फिर आप ये कहो कि--"कर देता तो उसका क्या जाता?"
ये गलत है!

यह विषय बहुत छोटा है, किन्तु अक्सर मैंने लोगो को घर में, चाहे वो पति-पत्नी हों या सास-बहु, माँ-बच्चे, सबको इस काम के विषय पर लड़ते देखा है!
"ये काम तुम्हारा किया , तो क्या तुम इतना नहीं कर सकते?"

प्यार से ऐसी बाते हो तो आनंद आता है, लेकिन इस विषय पर लड़ाई का कोई ओचित्य ही नहीं है!
क्युकी हम सब बुद्धिजीवी हैं, और अपने दिमाग से सोचकर ही सब करते हैं! और अगर दिल नहीं किया तो नहीं करते हैं! फिर उस बात को कोई थोप नहीं सकता!

आपके विचारो का स्वागत!

गूंज झाझारिया!








7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर गुंज, सही कहा .......अगर दूसरों से उम्मीद की भावना रख कर किसी के लिए काम किया जाये तो क्या किया ,........!!

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  2. Nice...
    आजकल मनुष्य के दिमाग मै ये छवी बन चुकी है कि अपने अन्दर छुपे शैतान तो अनदेखा करे और सामने वाले के शैतान को गली दे ... औरतों मै हमेशा से लगाई भुजाई वाली प्रवर्ती रही है वो वो अपनी ख़ुशी दूसरों को दुखी करेने मै देखती है ... ये कभी नहीं बदलने वाला ये किट-किट तो एक श्राप है बस शर्म कि यही बात है कि इसे अभी तक चलाया जा रहा है यूँ तो नहीं. देखे अब क्या होता है इसका फिर मजाक या लड़ाई.

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  3. धन्यवाद उपासना जी!
    सही कहा नेकी कर दरिया में डाल....

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  4. रश्मि प्रभा जी !
    आभार आपका यहाँ आने के लिए!

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  5. Anil ji-यहाँ सिर्फ औरतों की बात नहीं है !
    बात यहाँ सबकी हो रही है !
    इस काम में आदमी भी कम नहीं होते !

    आदमी भी कहते हैं ---तू मेरा ये काम नहीं कर सकती , मैं पूरा दिन वहां थक के आता हूँ ..:P
    और आदमी भी गिना देते है अपनी पत्नियों को ,मैंने तेरा वो काम कराया था ....

    वैसे ये कभी नहीं बदलने वाला ये किट-किट तो एक श्राप है बस शर्म कि यही बात है कि इसे अभी तक चलाया जा रहा है यूँ तो नहीं. देखे अब क्या होता है इसका फिर मजाक या लड़ाई.
    ये अच्छा लिखा है ...सबके लिए लागू होता है लेकिन ...

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