सोमवार, 23 जुलाई 2012

प्रिय समाज,


प्रिय समाज,

आप तो सकुशल ही रहते हैं...मैं आपको यह खत इसलिए लिख रही हूँ क्युकी मैं आपको जानना चाहती हूँ कि आखिर आप हैं कौन? कैसे दिखते हैं? आपके दर्शन कहाँ हो सकते हैं?
इन सब का जवाब आप मुझे अगले खत में दे देना..अभी ओर भी सवाल हैं, वैसे तो आपको समय नहीं, इतनी सब चिंताए हैं आपके पास..फिर भी इस खत को पूरा पढियेगा..
बचपन से हमारे यहाँ का हर बालक यही सुनकर बड़ा होता है.."समाज के नियम कायदे".."लोग क्या कहेंगे".."लोगो को क्या जवाब देंगे?"
हर किसी को यही चिंता..सब चिंता में कुछ ना कुछ गलत ही कर बैठते हैं..सब झूठ बोलते हैं..सब फरेबी हैं..सबके दोगले चेहरे हैं..भीतर है प्यार,ख्वाहिशें, सपने, खुलकर जीने की तमन्ना, दूसरों की मदद जर्ने की इच्छा..बंटकर खाने का मन..
और बाहर..पूछिए मत..सिर्फ रोक-टोक, मन को मारना, इछाओ को दबाना..झूठ बोलना, चोरी करना,,खूब सारा पैसा इक्कठा करके शान दिखाना..लोगो से वाहवाही लूटना..(जो मिलती नहीं.)..द्वेष भावना, तिरस्कार ...आदि आदि..

जब सब बुराइयों और कुरीतियों की जड़ है ये समाज शब्द ..जिसे शुरुआत में मनुष्य को एक सामाजिक, मिलनसार और पूर्ण रूप से इंसान बनाने के लिए पैदा किया गया था..उस शब्द के सहारे ना जाने कितनी कुरीतियाँ और बुराइया पनपती रही..हर कोई भुगतता रहा, हर कोई तिल तिल मरता रहा..सभी को इंसान चाहिए था..पर कौन करे इंसान? कौन परिभाषित करे इस "समाज" को? अरे नहीं! मैं आपको जिम्मेदार नहीं कह रही हूँ....आप सोये रहते हो और आपका नाम लेकर लोग लूट पात करते हैं...जैसे पहले जागीरदारो के समय होता था...
कौन कहे कि "यह हमारा समाज है..हम इसे मैला नहीं होने देंगे..कुरीतियों से हमारे समाज को गन्दा करने का किसी को कोई हक नहीं..."
जब ये सवाल उभरे मन में तो विचलित मन को कोई जवाब ना सूझा..बात ये हैं, कि यह निर्बोध मन इतना ही नहीं जनता कि समाज कौन है? किसके पास जाऊ कहने कि लोग आपका नाम लेकर बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं..और इतने धो चुके हैं कि गंगा भी मैली हो गई और आपका  नाम भी..तभी फैसला लिया आपको यह खत लिखने का ...
जिस नारी कि पूजा होती थी मेरे देश में..जिस नारी के एक क्रोध भरी नजरो से भस्म हो जाते थे राक्षश, सूख जाती थी नदियाँ...उस नारी का यह हाल?
और फिर किस मुह से कहते हो  कि तुम परम्पराओ का पालन कर रहे हो, इसलिए पाबन्दी लगा रहे हो...किसी की जिंदगी के फैसले लेने का हक तुम्हें किसने दिया? क्युकी तुम बलवान हो या क्युकी तुम ऐसा करके सभी लोगो का आदर पाना चाहते हो?
नारी को धिक्कारा..चलो ठीक है..नारी तो धरती है...समा ली तुम्हारी सारी बुराइयां अपने भीतर...(इस कार्य में कुछ स्त्रियां भी शामिल हो सकती हैं, अतः यह नारी पुरुष की लड़ाई पर आधारित नहीं है यह बात)...
तो अब बात बच्चो की...
किसने हक दिया तुम्हें उस कच्ची उम्र में उनका बचपन छीनकर उनका ब्याह रचाने का..?
अगर देखभाल करना  इतना भारी लग रहा था तो क्यों पैदा किया..? अपने आनंद के लिए तुने उसे पैदा किया और अब तू उसे अपना गुलाम बनाकर उससे नौकर की तरह हर बात मनवाना चाहता है..? तू तो अभिभावक बनने के लायक भी नहीं था...(उन सभी माता -पिताओ के लिए जो अपनी सोच जबरदस्ती थोपते हैं और ये दुहाई देते हैं की हमने तुम्हें पैदा किया)
चलो बालकों की छोडो,..
जीवन का आधार, इंसानियत का सबसे कीमती गुण "प्रेम"
तुमने तो इस पर भी रोक लगा दी...तुम्हारा ये दोगलापन मुझे समझ नहीं आता ...स्त्री का पति मर गया तो उसकी शादी बिना मर्जी जाने उसके देवर से करवा दो, और यदि शादीशुदा होते हुए उसे किसी और से प्रेम हो गया या वो अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती , दूसरा विवाह करना चाहती है..तो उसका सर मुंडवा कर उसे निर्वस्त्र कर दो कि समाज के खिलाफ है.. इसे मैं क्या समझू?
किसी भी नियम , कायदे-कानून के पीछे कोई व्याख्या नहीं...बस अपने हिसब से तोडा..जो जितना बलवान था , उसकी बात मानी, और बन गए समाज के नियम..
तुम किसी मंदिर में जाकर किसी भगवान कि पूजा के लायक नहीं हो..तुम्हारी इस जिद की वजह से रोज इंसानियत शर्मसार होती है...भगवान शिव सती के विवाहिता थे, किन्तु दूसरा विवाह किया पार्वती से, क्यों ?
क्युकी उन्हें पारवती से प्रेम था.सती अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव की विवाहित बनी...क्यों? क्युकी उन्हें भगवान शिव से प्रेम था...तुम्हारे नियम के अनुसार भगवान शिव और माता सती भी गलत थे?
यदि नहीं तो इस दोगलेपन का जवाब चाहिए मुझे..
मैं एक जीता जागता इंसान हूँ, मुझे भी पूरा हक है अपनी समझ के हिसाब से फैसले लेने का..
सभी इंसानी रिश्तों से परे तुम तो राक्षश बन चुके हो..
इस कलयुग में भगवान के अवतार लेने की उम्मीद नहीं है....और इंसान को ये नेता और कानून कुछ करने नहीं देगा..वोट तो ये समाज ही दिलवाता है ना..
फिर भी मैं अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने के लिए प्रतिबद्ध हूँ..और आपका किसी तरह का कोई दबाव मुझे स्वीकर्य नहीं होगा...

इसी समाज में रहने वाला प्राणी..

2 टिप्‍पणियां:

  1. काश इनमें से एक भी प्रश्न का उत्तर दे पाता यह समाज तो शायद इस सामज नाम के मायने सिद्ध हो जाते। विचारणीय आलेख...

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  2. बहुत विचारणीय बात कही आपने गुंज .........बहुत सुन्दर

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