शनिवार, 4 अगस्त 2012

आने दो राजनीति में



मेरे देश की रामलीला समझने का प्रयत्न किया...पर समझ नहीं आई...
अन्ना जी जब शुरू में अनशन पर बैठे थे पिछले साल, तब तो सारे देश के वासी चिल्ला रहे थे “अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं” ...फिर कुछ दिनों बाद अन्नाजी को सरकार ने धोखा तो दिया ही, जो सरकार की पुरानी आदत है..पर साथ में उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाले लोगो ने भी अपना दामन छुडा लिया..इससे अन्ना जी को यह बात तो समझ आ गई थी कि हमारे भारत देश में कुछ अच्छा करना कितना मुश्किल है..एक तरफ पैसा-पैसा-पॉवर-पॉवर चिल्लाती मिडिया...एक तरफ हमारी भूखी-नंगी सरकार, एक तरफ अनपढ़-गंवार-१०वी या १२वी पास, अपराधिक प्रवर्ती के मंत्री गण, और एक तरफ हमारी बेवकूफ जनता....(माफ कीजियेगा जनता को बेवकूफ कहना स्वाभाविक था, और मेरी गिनती भी उसी में कर सकते हैं..)
अब चारों ओर से ही वार होंगे, तो बड़े से बड़े धुंरधर और सच्चे इंसान की रणनीति में थोड़ी बहुत कमी तो रह जायेगी..
अब आप चाहेंगे कि जो भी बोला है, अक्षरशः समझाया जाए आपको..
१) पैसा –पैसा-पॉवर –पॉवर करती मिडिया.. हाँ , हमारी मिडिया है जो समझती है जनता बेवकूफ है..(जो की है..) तो उसे बेवकूफ बनाओ, जितना हो सके....आपने ध्यान दिया हो ना दिया हो, पर मैंने जरुर दिया है..जब भी कोई दुर्घटना होती है..तो दुर्घटना की सही खबर पहुँचाना, वहाँ कितने हताहत हुए हैं, उनकी सही सही जानकारी देना...और दूर बैठे परिजनों को पीडितों तक पहुंचाने में मदद करना, और भी ज्यादा कुछ करना चाहते हैं तो लोगो को हिम्मत देना, एवं दुर्घटना क्यों हुई, आगे से ऐसी दुर्घटना से कैसे बचा जा सकता है ऐसे अभियान चलाना है, हमारी मिडिया का काम!
और करती क्या है? “हांजी...ताज़ा समाचार हैं कि कल हमारे मुख्य-मंत्री जी दुर्घटना स्थल का दौरा करेंगे,
वो हैलीकॉप्टर से जाएंगे या प्लेन से या पैदल..कितने बजे नाश्ता करेंगे, कितने बजे घर से निकलेंगे, कितने बजे वहाँ पहुंचेगे, कितनी देर रुकेंगे, रोयेंगे या हसेंगे, और अगर सरकार के विरोध में बोलना है तो ये देखिये, ऐसी है हमारी सरकार, देखिये कितनी दुर्घटनाये हुई, हमने मुख्यमंत्री जी को फोन किया किन्तु वो फोन पर नहीं आये...जनता को जवाब चाहिए,,,आखिर सरकार क्या कर रही है? कितनी जिंदगियों को मौत के घाट उतरना पड़ा.....बस..
२) जनता बेवकूफ इसलिए कि जो कह दिया गया उन्होंने मान लिया...हाँ यार सरकार कुछ नहीं करती, मतलब कितने लोग मर गए, सब सरकार की वजह से...बस पैसा खाती है..जैसी हवा चली, उधर बह लिए...जिसने जो कहा मान लिया..और विरोध करने में तो हमारी जनता को पी.एच.डी. है..पुतले फूंकना, नारे लगाना, रेलियां निकालना, इन सब में माहिर है...
३,४) हमारी भूखी-नंगी सरकार, एक तरफ अनपढ़-गंवार-१०वी या १२वी पास, अपराधिक प्रवर्ती के मंत्री गण..इसके बारे में तो कुछ कहने की कोई जरुरत नहीं...पिछले साल अन्ना के समर्थन के समय लोगो को एक हवा में बहते देख इन सब की बौखलाहट बता रही थी कि क्या सही है और क्या गलत...

अब मुद्दे की बात करते हैं, अन्नाजी को भी इन चारों बिमारियों से लड़ना था..वो लड़े,,क्या हुआ अगर कहीं कहीं चूके..या बहुत जगह चूके. मगर उनके इरादों में मुझे कभी गन्दी बू नहीं आई...
जब अन्नाजी की रणनीतियाँ इस धूर्त सरकार, भटकी मिडिया और बेवकूफ जनता की वजह से नहीं चल पाई...तब उन्होंने फैसला किया की उन्हें राजनीती में ही आना होगा, शायद यहीं आकर वो कुछ भला कर सकते हैं देश का..
एक बात यहाँ मैं साफ़ कर दूँ कि मैं यह लेख निष्पक्ष होकर लेख रही हूँ..ना ही मैं अन्ना के समर्थन में हूँ, ना ही विरोध में...!
एक सवाल जो उठ रहा है, वह यह..कि जब सारे घोटालों में लिप्त लोग नेता बन रहे हैं, जब सारे अपराधिक प्रवर्ती के लोग चुनाव लड़ रहे हैं...तो अन्ना जी के राजनितिक फैसले पर इतना विरोध क्यों? अगर आप यह कहते हैं कि अन्ना सिर्फ राजनीती में आना चाहते थे, यह उनका मकसद था, उनके इरादें नेक नहीं हैं.....तो जवाब है “आप ही हैं जनाब, जो सभी भूखे और लूट-पात मचाने वाले नेताओं को वोट देते हैं. ज्यादातर नेताओं के इरादे मुझे ठीक नहीं लगते, तो जिसने इतना अनशन किया, लड़ाई की..उसे भी आने दो मैदान में, एक बार उसे भी मौका दो..अगर कुछ नहीं किया तो बाकी नेताओं की तरह इन्हें भी झेल लेंगे...यदि कुछ अच्छा कर दिया तो ठीक है..
आप घबरा क्यों रहे हैं..क्या आपको वाकई लगता है हमारा लोकतंत्र इतना कमजोर है कि यदि कोई राजनीति में आना चाहता है इसका मतलब वो सिर्फ खाना चाहता है..या फिर कोई भी राजनीती में आकर सचाई की राह नहीं अपना सकता...
यदि ऐसा है तो आप खुद पर सवाल कर रहे हैं...मेरा मानना है कि देश के ढांचे को बदलने के लिए राजनीती के ढांचे को सुधारना होगा..और उसके लिए यदि कोई आगे आये, तो आने दो..हमारा ढांचा इतना बिगड चूका है कि और तो बिगड़ने की कोई गुंजाईश नहीं है...किसी को बिना मौका दिए, आप कैसे तय कर सकते हैं कि वह किस इरादे से और क्यों आना चाहता है...
और एक आखिरी सलाह, मिडिया को सुने, पर उसकी भाषा ना बोले...आप तय करे कि किसमे ज्यादा नुकसान है..मेरे हिसाब से मौका देना ही ठीक रहेगा..इआदों का पता लग जायेगा कि आखिर इतने अनशन क्यों किये? दूसरा हमें कभी यह नहीं लगेगा कि जब कोई आया था मशाल लेकर सुधरने देश, हमने उसका साथ नहीं दिया..
आने दो राजनीती में,..अगर कुछ ना भी किया तो ६० साल से झले रहे हैं ऐसे नेताओं को...५ साल और सही..
जय हिंद..

गुंजन झाझरिया "गुंज"

1 टिप्पणी:

  1. वाह गुंजन निष्पक्ष भाव से बहुत ही अच्छा और सशक्त लेख लिखा है तुमने, बधाई...तुम्हारी एक बात से में पूरी तरह सहमत हूँ कि यदि कोई आना चाहता है राजनीति में तो उसे आने देना चाहिए। क्यूंकि वाकई हमारे देश का ढांचा इस कदर बिगड़ चुका है कि अब और कुछ बिगड़ना शेष नहीं,मगर अफसोस सिर्फ इस बात का होता है कि हमारी जनता ही पूरी बेवकूफ है, जो या तो गलत इंसान को चुन लेती है। या फिर बहुत से लोग किसी को भी चुनते ही नहीं अर्थात वोट डालते ही नहीं, यह सोचकर कि इतने सालों से नतीजे सामने है आगे भी कुछ होने जाने वाला है नहीं इसलिए राजनीति से दूर ही रहो वही अच्छा है। in total होता यह है, कि राजनीति के क्षेत्र की गंदी को हटाकर साफ सुथरा सभी देखना चाहते है। मगर उसमें खुद जाकर उस गंदगी को साफ करना कोई नहीं चाहता और यदी इसी बात को मैं सरल शब्दों में कहूँ तो "भगत सिंह पैदा हो यह सभी चाहते हैं, मगर पड़ोसी के घर में" राजनीति को लेकर यही रवैया है हमारे देश वासियों का जिसे आज के हालातों को देखते हुये बदलना शायद नामुमकिन सी बात है।

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